अगर सब कुछ लिखा है… तो Remedies क्या भगवान से भी Powerful हैं?
अगर नियति पहले से तय है… तो एक नीलम कैसे बदल देता है? एक मंत्र कैसे भविष्य बदल देता है? क्या एक रत्न भगवान से भी ज़्यादा ताकतवर हो गया?
रुकिए।
इस सवाल को हल्का मत समझिए। यह सवाल ज्योतिष की नींव पर चोट करता है। अगर इसका जवाब नहीं है — तो पूरा सिस्टम खोखला है। अगर जवाब है — तो शायद आप नियति को वो समझ ही नहीं रहे जो वो है।
लोग इसे "किस्मत" कह देते हैं। लेकिन वैदिक दृष्टि में इसका नाम है — प्रारब्ध। और प्रारब्ध "किस्मत" से कहीं गहरा है। किस्मत सुनकर लगता है जैसे कोई लॉटरी है — लग गई तो अच्छी, नहीं लगी तो बुरी। प्रारब्ध ऐसा नहीं है। प्रारब्ध वो हिसाब है जो तुमने खुद लिखा है — जन्मों में, कर्मों में, चुनावों में।
तो सवाल दोबारा पूछो — क्या remedy उस हिसाब को मिटा सकती है?
सबसे पहले — शंका की बात सुनते हैं। पूरी।
मैं वो ज्योतिषी नहीं हूँ जो आपके सवाल सुनकर बचाव की मुद्रा में आ जाए। आपका सन्देह सही जगह है। चलो ईमानदारी से रखते हैं:
अगर सब कुछ प्रारब्ध कर्म से तय है — तो बदलाव कैसे मुमकिन है? और अगर बदलाव हो सकता है — तो "तय" का सिद्धांत ही झूठा है, नहीं?
अगर कोई ज्योतिषी remedy बताता है और ज़िन्दगी बेहतर हो जाती है — तो मतलब पहली भविष्यवाणी ही गलत थी? और अगर remedy काम नहीं करती — तो "पुरुषार्थ कमज़ोर था" बहाना?
यह गोल-गोल तर्क लगता है। मैं समझता हूँ।
लेकिन यह गोल-गोल इसलिए लगता है क्योंकि एक बुनियादी चीज़ गलत समझी जा रही है — नियति का मतलब ही।
नियति = घटना नहीं, ढाँचा है
ज़्यादातर लोग नियति को एक लिखी हुई पटकथा मानते हैं। जैसे कोई फिल्म पहले से शूट हो चुकी है और आप बस देख रहे हो। यह समझ अधूरी है।
नियति मौसम के पूर्वानुमान की तरह है। बारिश लिखी हो सकती है। लेकिन तुम छाता ले जाओगे या भीगोगे — यह तुम्हारा फ़ैसला है। बारिश नियति है। छाता remedy है। बारिश बंद नहीं होगी — लेकिन भीगना ज़रूरी नहीं।
अब इसे वैदिक भाषा में समझो। आपके कर्मों का एक पूरा भंडार है — जन्मों-जन्मों का। हर वो चीज़ जो आपने कभी की, सोची, चुनी — उसका हिसाब इस भंडार में है। वैदिक शास्त्र इसे संचित कर्म कहते हैं। अब इस विशाल भंडार में से एक हिस्सा इस जन्म के लिए सक्रिय होता है — यही प्रारब्ध कर्म है। यही आपकी जन्म कुंडली में दिखता है। यही दशाएँ तय करता है, ग्रहों की स्थिति तय करता है, जीवन की मोटी रूपरेखा तय करता है।
लेकिन एक तीसरी परत भी है — और यही सबसे ज़रूरी है। वो कर्म जो आप अभी बना रहे हो। इसी पल। हर निर्णय, हर कोशिश, हर साँस के साथ। इसे क्रियमाण कर्म कहते हैं। यही आपका असली शक्ति-क्षेत्र है।
Remedy का काम प्रारब्ध को मिटाना नहीं है। Remedy का काम क्रियमाण को इतना मज़बूत करना है कि आप प्रारब्ध से समझदारी से निपट सको।
Remedy नियति नहीं बदलती — नियति की तीव्रता बदलती है
यह बात ठीक से समझो। क्योंकि यहीं पर सबसे ज़्यादा भ्रम है।
शनि कमज़ोर है कुंडली में? संघर्ष लिखा है। Remedy के बाद संघर्ष ग़ायब नहीं होता। लेकिन संघर्ष से गुज़रने का अनुभव बदल सकता है। जहाँ टूटने की नौबत थी, वहाँ सीखने का मौका बन जाता है।
इसे ऐसे समझो — तुम्हें पहाड़ चढ़ना है। यह तय है। Remedy पहाड़ हटा नहीं सकती। लेकिन remedy तुम्हें अच्छे जूते दे सकती है, रास्ता दिखा सकती है, और चढ़ाई से पहले तुम्हारी साँस मज़बूत कर सकती है।
एक और गहरी बात। भगवान ने बीज दिया है। नियति उस बीज की प्रकृति है। अगर बीज आम का है — तो आम ही बनेगा। Remedy उसे सेब नहीं बना सकती। लेकिन वो आम सूखा होगा, कीड़ा लगा होगा, या रसीला होगा — यह देखभाल पर निर्भर करता है। Remedy वो देखभाल है। पानी देना, धूप देना, समय पर सींचना। फल की प्रकृति नहीं बदलेगी — लेकिन फल की गुणवत्ता बदल सकती है।
अगर कुंडली में दुर्घटना का योग है — remedy उसे पूरी तरह रोक नहीं सकती। लेकिन जहाँ बड़ा ऑपरेशन होता, वहाँ बस एक खरोंच पर बात टल सकती है।
यह तीव्रता का खेल है। नियति का ढाँचा वही रहता है — लेकिन उस ढाँचे के भीतर कितना दर्द है, कितनी सीख है, कितना नुकसान है — वो बदल सकता है।
"भगवान से ज़्यादा ताकतवर?" — सवाल ही ग़लत है
जब कोई पूछता है "क्या remedy भगवान से ज़्यादा powerful है?" — तो सवाल ही ग़लत बना हुआ है। यह ऐसे है जैसे कोई पूछे — "क्या नाव नदी से ज़्यादा ताकतवर है?"
नदी और नाव का मुक़ाबला नहीं है। नदी बहती है — यह उसकी प्रकृति है। नाव उस बहाव में तुम्हें स्थिर रखती है — यह उसकी भूमिका है।
नियति नदी है। भगवान उसका स्रोत है। और remedy नाव है।
नदी की दिशा तय है। तुम उसे पलट नहीं सकते। लेकिन तुम बह जाओगे या पार करोगे — यह नाव तय करती है। Remedy नदी की धारा नहीं बदलती। Remedy तुम्हारी स्थिति उस धारा में बदल देती है।
ज्योतिष को वेदों का अंग माना गया है — वेदाङ्ग। यह कोई बाहरी तंत्र नहीं है। यह उसी ईश्वरीय व्यवस्था का हिस्सा है जिसमें सृष्टि चलती है। ग्रह भगवान की व्यवस्था हैं। कर्म भगवान की व्यवस्था है। और remedy भी भगवान की व्यवस्था है।
सवाल "भगवान बनाम remedy" का है ही नहीं। Remedy उसी खेल का एक मोहरा है जो ईश्वर ने रचा है।
असली खेल: जागरूकता
ज्योतिष भविष्य बदलने का साधन नहीं है। ज्योतिष जागरूकता का साधन है।
एक इंसान जो अँधेरे में चल रहा है — उसे ठोकर लगेगी। वही इंसान अगर रास्ते में रोशनी ले जाए — ठोकर से बच सकता है। ज्योतिष वो रोशनी है। Remedy वो सावधानी है जो रोशनी देखकर आप बरतते हो।
लेकिन यहाँ एक कड़वी सच्चाई भी है। Remedy जुआ नहीं है। "चलो पहन लेते हैं, क्या पता काम कर जाए" — यह श्रद्धा नहीं, यह लापरवाही है। Remedy तब काम करती है जब उसके पीछे समझ हो। ग़लत रत्न पहनना ग़लत दवाई खाने जैसा है — ज्योतिष फ़ैशन नहीं है कि जो अच्छा लगे पहन लो। और समय का भी हिसाब है — दशा, अन्तर्दशा, गोचर। बिना मौसम के बोया गया बीज फल नहीं देता। बिना सही समय के की गई remedy भी नहीं देती।
एक ख़तरनाक लेकिन ज़रूरी बात
ज़रा यह सोचो:
शायद नियति में ही लिखा था कि तुम यह लेख पढ़ोगे। शायद नियति में ही लिखा था कि तुम किसी ज्योतिषी से मिलोगे। शायद नियति में ही लिखा था कि तुम remedy अपनाओगे।
तो फिर विरोधाभास कहाँ रहा?
यही तो बात है — नियति सिर्फ़ "क्या होगा" नहीं बताती। नियति "तुम क्या करोगे" भी अपने अंदर समेटे हुए है। तुम्हारी पसंद, तुम्हारी खोज, तुम्हारी remedy — यह सब नियति के विरुद्ध नहीं, नियति के भीतर है।
विरोधाभास बाहर से दिखता है। भीतर से देखो तो सब एक ही धारा है।
जब राहु ने ज़िन्दगी उलट दी
वो रात को तीन बजे तक जाग रहा था। मोबाइल स्क्रॉल करता हुआ। किसी अजीब-सी बेचैनी के साथ — जिसका कोई नाम नहीं था, कोई वजह नहीं थी। बस एक घुटन। हर हफ़्ते कोई नया आइडिया। हर महीने कोई नया लक्ष्य। और हर बार — अधूरा छोड़ देना। लोगों से बात करने में चिढ़। अकेले में भी चैन नहीं। जो इंसान पहले स्थिर था, अब लगातार भटक रहा था — बिना यह जाने कि भटक रहा है।
राहु महादशा चल रही थी।
कुंडली देखी गई। राहु की स्थिति ने मन को भीतर से अस्थिर किया हुआ था। वो बेचैनी उसकी कमज़ोरी नहीं थी — वो ग्रह की ऊर्जा थी जो बिना दिशा के बिखर रही थी।
Remedy दी गई — राहु मंत्र का नियमित जाप, एक अनुशासित दिनचर्या, और कुछ विशेष सावधानियाँ।
क्या राहु महादशा ख़त्म हो गई? नहीं। क्या राहु की ऊर्जा बदल गई? नहीं।
लेकिन वो ऊर्जा जो बिखर रही थी — वो एक दिशा में बहने लगी। तीन बजे की नींद धीरे-धीरे लौटी। अधूरे प्रोजेक्ट्स में से एक पूरा हुआ। फिर दूसरा। जो बेचैनी थी, वो रचनात्मकता में बदली। जो उलझन थी, वो खोज में बदली।
Remedy ने राहु को नहीं बदला। Remedy ने इंसान को इतना तैयार किया कि वो राहु की ऊर्जा को सह सके — बल्कि इस्तेमाल कर सके।
यही फ़र्क है। Remedy ग्रह नहीं बदलती। Remedy इंसान बदलती है।
आख़िरी बात — शांत लेकिन गहरी
ज्योतिष का मतलब भगवान को चुनौती देना नहीं है। ज्योतिष का मतलब भगवान के बनाए नक़्शे को पढ़ना सीखना है।
Remedies नियति को धोखा नहीं देतीं। Remedies नियति के साथ सहयोग करती हैं।
तुम बारिश नहीं रोक सकते — लेकिन छाता ले जा सकते हो। तुम नदी की धारा नहीं मोड़ सकते — लेकिन नाव चला सकते हो। तुम बीज की प्रकृति नहीं बदल सकते — लेकिन फल की गुणवत्ता ज़रूर बदल सकते हो।
और शायद…
सवाल यह कभी था ही नहीं कि remedies ताकतवर हैं या नहीं।
असली सवाल यह है — कि जिस नियति से तुम ज़िन्दगी भर डरते रहे, क्या तुमने कभी उसे समझने की कोशिश भी की?
लेखक वैदिक ज्योतिष के अध्ययन और अभ्यास से जुड़े हैं और Mastroify के संस्थापक हैं।
Mohit