
वृश्चिक राशि वह है जहाँ चेतना अपने आप को विसर्जित करने जाती है। मंगल इस राशि पर शिव के तृतीय नेत्र की भाँति शासन करता है — विनाश के लिए नहीं, बल्कि उसे जलाने के लिए जो आत्मा और उसकी असली पहचान के बीच आड़े आ रहा है। वृश्चिक का विष शस्त्र नहीं, औषधि है — वही तीव्रता जो आसक्ति को तोड़ती है, वही जागरूकता में भी रूपान्तरित होती है। तुला ने जो तौला था, वृश्चिक उसे हर भार से परे बदल देता है। बारह राशियों के चक्र में वृश्चिक मृत्युञ्जय का सिद्धान्त है — मृत्यु को टालकर नहीं, उसमें पूरी तरह उतरकर उस पर विजय।
तत्व
जल
स्वामी ग्रह
मंगल
रत्न
मूँगा (लाल प्रवाल)
शुभ दिन
मंगलवार
सामान्य परिचय
| तत्व | जल |
| गुणवत्ता | स्थिर |
| ध्रुवता | स्त्री |
| स्वामी ग्रह | मंगल |
| पश्चिमी सूर्य-राशि संदर्भ | Oct 23 - Nov 21 (वैदिक चन्द्र/लग्न राशि इससे तय नहीं होती) |
| स्वभाव | स्थिर (अचल) |
| गुण | तमस |
| वर्ण | ब्राह्मण |
| दिशा | उत्तर |
अपनी वैदिक राशि कैसे जानें
Western sun-sign dates वैदिक राशि तय करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। चन्द्र राशि और लग्न जन्म-तिथि, सटीक जन्म-समय, जन्म-स्थान और अयनांश से गणना करके निकाले जाते हैं। पहले कुंडली देखें, फिर वृश्चिक राशि का यह पृष्ठ अर्थ समझने के लिए पढ़ें।
स्रोत और पद्धति
स्रोत और पद्धति
- शास्त्रीय आधार में बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, सारावली, जैमिनि सूत्र और बी. वी. रमन संदर्भों को जहां लागू हो, माना गया है।
- वैदिक राशि संदर्भ निरयन हैं। गणना और प्रसिद्ध व्यक्तित्वों के चन्द्र-राशि उदाहरणों में, जब तक अलग से न लिखा हो, लाहिरी अयनांश माना गया है।
- प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का जन्म डेटा स्रोत-गुणवत्ता के साथ पढ़ें; AstroDatabank Rodden ratings और AstroSage संदर्भों में भी अनिश्चितता हो सकती है।
- रत्न और medical astrology शैक्षिक संकेत हैं, prescription नहीं। केवल राशि के आधार पर रत्न न पहनें और स्वास्थ्य-निर्णय न लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वृश्चिक राशि का स्वामी ग्रह कौन है?
वृश्चिक (Scorpio) राशि का स्वामी ग्रह मंगल (Mangala) है। यह वृश्चिक के मुख्य गुणों रूपान्तरण, मृत्यु-पुनर्जन्म, शक्ति को दिशा देता है।
क्या वृश्चिक राशि Western date range से तय होती है?
नहीं। Oct 23 - Nov 21 केवल पश्चिमी सूर्य-राशि संदर्भ है। वैदिक ज्योतिष में चन्द्र राशि और लग्न जन्म-तिथि, सटीक जन्म-समय, जन्म-स्थान और अयनांश से निकाले जाते हैं।
वृश्चिक राशि के मुख्य गुण क्या हैं?
वृश्चिक जल तत्व की राशि है। सकारात्मक गुणों में तीव्र, भावुक, खोजी, निष्ठावान, रूपान्तरणकारी आते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति का पूरा फल लग्न, चन्द्र, ग्रह-स्थिति और दशा देखकर ही समझा जाता है।
शब्द-उत्पत्ति एवं अर्थ
शब्द उत्पत्ति
"वृश्चिक" — मूल है "√व्रश्च्" — काटना, छेदना, भेदना। बिच्छू संस्कृत में है "वृश्चिक" — अर्थात् "काटने वाला", "भेदने वाला।" लेकिन ध्यान दीजिए: यह काटना विनाश का काटना नहीं है। इसी जड़ से बनता है "वृश्चन" — शस्त्रक्रिया का चीरा, सर्जन का कट। संस्कृत चिकित्सा-साहित्य में बिच्छू का डंक और सर्जन का चाकू एक ही भाषाई परिवार के सदस्य हैं। काटना तब पवित्र है जब वह माया को काटे, रोग को काटे — व्यक्ति को नहीं।
ब्रह्मांडीय संबंध
वैदिक ब्रह्मांडविद्या में वृश्चिक "मृत्युंजय" के सिद्धांत से जुड़ी है — मृत्यु को जीतना, उससे भागकर नहीं बल्कि उसमें जाकर। महामृत्युंजय मंत्र — त्र्यम्बक को संबोधित — मृत्यु से मुक्ति का वर्णन करता है जैसे ककड़ी बेल से अलग होती है: स्वाभाविक रूप से, पके समय पर। यह वृश्चिक का पाठ है। इसके अलावा समुद्रमंथन: उस मंथन में हलाहल निकला — वह विष जो समूची सृष्टि को नष्ट कर सकता था। केवल शिव उसे पी सके, और उन्होंने पिया, कंठ में धारण करके। वृश्चिक की ब्रह्मांडीय भूमिका यही है: विष को अमृत में बदलना।
राशि महत्त्व
वृश्चिक आठवीं राशि है — और आठवाँ भाव सीधे इससे मेल खाता है: आयु भाव, मृत्युस्थान, रहस्य स्थान। यह वह स्थान है जहाँ राशिचक्र उस चीज़ का सामना करता है जो नियंत्रित नहीं की जा सकती — जीवन भी नहीं। तुला ने तौला, वृश्चिक ने गलाया। धनु उस गलाने के बाद उभरती है — एक व्यापक दार्शनिक अर्थ लेकर, उस अंधकार के उस पार। वृश्चिक वह आवश्यक रात्रि है जो किसी भी वास्तविक प्रकाश से पहले आती है।
गुण एवं स्वभाव
सकारात्मक गुण
चुनौतीपूर्ण गुण
मुख्य शब्द
शारीरिक विशेषताएँ
| शरीर का प्रकार | बलिष्ठ, सुगठित |
| रंग-रूप | साँवला, चुम्बकीय |
| कद-काठी | मध्यम |
| शरीर के अंग | प्रजनन अंग, श्रोणि क्षेत्र, मूत्राशय, मलाशय |
इस राशि के नक्षत्र
विशाखा का चौथा चरण वृश्चिक में आता है — केवल एक चरण, पर इस एक चरण में राशिचक्र का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। तुला के तीन चरणों में विशाखा का लक्ष्य सामाजिक आवरण के भीतर छुपा था — मुस्कुराता हुआ, कूटनीतिक, धैर्यवान। और अब चौथे चरण में वृश्चिक की भूमि पर उतरते ही वह आवरण हट जाता है। यहाँ लक्ष्य छुपता नहीं — यह और गहरा हो जाता है, और अदृश्य हो जाता है। तुला में जो महत्त्वाकांक्षा सामाजिक थी, वृश्चिक में वह व्यक्तिगत और अटल हो जाती है। देखिए यह अंतर: तुला के विशाखा जातक को लोग जानते थे, पहचानते थे। वृश्चिक के इस चरण का जातक चाहता ही नहीं कि कोई जाने। इंद्र-अग्नि की शक्ति अब भूमि के नीचे जाती है — और जो भूमि के नीचे काम करता है, वह सबसे शांत दिखता है और सबसे गहरा होता है। यही इस चरण का सार है: वह संकल्प जो किसी को नहीं दिखता, पर जिसे कोई रोक भी नहीं सकता। विशाखा का अर्थ है दो शाखाओं वाला — और इस चरण में वे दो शाखाएँ हैं: बाहर से शांति, भीतर से तूफ़ान। और दोनों एक साथ।
अनुराधा — वृश्चिक के चारों चरण, स्वामी शनि, अधिदेवता मित्र देव। और मित्र कौन हैं? वे देवता जो मैत्री, सन्धि, और उन गठबंधनों के रक्षक हैं जो संकट में भी नहीं टूटते। अब सोचिए — वृश्चिक जो राशि गोपनीयता के लिए जानी जाती है, जो अपने भीतर के संसार को किसी से साझा नहीं करती — उसी राशि में मैत्री का नक्षत्र। यह विरोधाभास नहीं, यह वृश्चिक की सबसे गहरी शिक्षा है। अनुराधा कह रहा है: सच्ची मित्रता वह नहीं जो सुख में हो — सच्ची मित्रता वह है जो वृश्चिक की गहराई में भी टिके। जो तुम्हारे सबसे अँधेरे रूप को देखे और जाए नहीं। शनि का अनुशासन यहाँ मैत्री को एक विशेष गुण देता है: ये संबंध समय के साथ गहरे होते हैं, सतही नहीं। अनुराधा जातकों के मित्र कम होते हैं — पर जो होते हैं, वे जीवनभर के होते हैं। ध्यान दीजिए — शनि देरी देते हैं पर देते ज़रूर हैं। तो अनुराधा में वृश्चिक का अर्थ यह है: जो रिश्ते इन्हें मिलते हैं, वे तत्काल नहीं मिलते। पहले परीक्षा होती है — लम्बी, शांत, अदृश्य। और जो उस परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, उसे ये जातक जो देते हैं वह असाधारण है। वह निष्ठा जो संसार में दुर्लभ है। सूफ़ी परम्परा में जिसे हम-दम कहते हैं — हृदय का साथी — वह अनुराधा का ही स्वरूप है।
ज्येष्ठा — वृश्चिक का अंतिम नक्षत्र, चारों चरण इसी राशि में। स्वामी बुध, अधिदेवता इंद्र — देवताओं के राजा, शक्ति के शिखर पर बैठे। और ज्येष्ठा का अर्थ? ज्येष्ठ — सबसे बड़ा, सबसे वरिष्ठ। यह नक्षत्र वरिष्ठता का है, उस अधिकार का जो अनुभव से आता है — पद से नहीं। बुध की बुद्धि और इंद्र की शक्ति — और ये दोनों वृश्चिक की गहराई में। यह शायद पूरे राशिचक्र का सबसे तीव्र वृश्चिक-भाव है। ज्येष्ठा वह नक्षत्र है जहाँ सत्ता का बोझ पूरी तरह महसूस होता है। इंद्र महाराज हैं — पर इंद्र जानते हैं कि उनका इंद्रासन सनातन नहीं है। यही ज्येष्ठा जातकों का अनुभव है: इन्हें निर्णय लेने पड़ते हैं जो दूसरे नहीं ले सकते। इन्हें वह भार उठाना पड़ता है जो दूसरों को दिखता भी नहीं। और इस भार के साथ एक विशेष एकाकीपन भी आता है — जो शिखर पर होता है, वह पूरी तरह अकेला होता है। ध्यान दीजिए — ज्येष्ठा को कभी-कभी कठिन नक्षत्र कहा जाता है। पर यह कठिनाई उस व्यक्ति की कठिनाई है जिसे साधारण जीवन नहीं मिला — जिसे हमेशा अधिक देना पड़ा, अधिक सहना पड़ा, अधिक समझना पड़ा। बुध यहाँ वृश्चिक की गहराई में उतरकर एक ऐसी बौद्धिक शक्ति बनाता है जो दूसरों को दिखता नहीं — और यही इन जातकों की सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ी परीक्षा भी। जो अपनी गहराई को समझ ले, वह ज्येष्ठा का पूरा वरदान पाता है। जो उससे डरे, वह उसी में उलझा रहता है।
इस राशि में ग्रह
नीचे दी गई व्याख्याएँ प्रत्येक ग्रह के वृश्चिक में सामान्य स्वभाव को दर्शाती हैं। पूर्ण चित्र के लिए ग्रह की डिग्री, नक्षत्र-स्थिति, दृष्टि, युति, वर्ग कुंडली (विशेषकर D9), और चल रही दशा की जाँच आवश्यक है। राशि-स्थिति प्रारम्भिक बिंदु है — निष्कर्ष नहीं।
कुंडली विश्लेषण बुक करें →अंदर मुड़ा योद्धा — अन्वेषण, धैर्य और मनोवैज्ञानिक सहनशक्ति
वृश्चिक में मंगल अपनी राशियों में से एक में है — स्वक्षेत्र — लेकिन जहाँ मेष का मंगल बाहरी योद्धा है, वृश्चिक का मंगल वही तीव्रता भीतर और नीचे की ओर मोड़ता है। यह शोधकर्ता, शल्य-चिकित्सक, अन्वेषक है: वह योद्धा जो खुले मैदान में नहीं बल्कि छिपी हुई वास्तविकता की सुरंगों में लड़ता है। ये जातक दुर्जेय मनोवैज्ञानिक सहनशक्ति और उन परिस्थितियों में फ़ोकस बनाए रखने की दुर्लभ क्षमता रखते हैं जो दूसरों को थका देंगी। क्लासिकल ग्रंथ इस स्थिति को साहस, गुप्त ज्ञान, शल्य-सटीकता, और उसके माध्यम से उपचार करने की क्षमता से जोड़ते हैं जो विनाशकारी लगता है। छाया: पुरानी लड़ाइयों में अटके रहना।
गहराई, अन्वेषण और छिपे ज्ञान से अधिकार
वृश्चिक में सूर्य शत्रु की राशि में है — मंगल और सूर्य का ज्योतिष में जटिल संबंध है जहाँ सूर्य मंगल को मित्र मानता है लेकिन मंगल सूर्य को तटस्थ। वृश्चिक के स्थिर जल में सौर प्रकाशित बाहरी अभिव्यक्ति का सिद्धांत भीतर की ओर निर्देशित होता है — जैसे एक सर्चलाइट भीड़ की बजाय अंधेरे में। ये जातक असाधारण इच्छाशक्ति और भेदक बुद्धि रखते हैं, लेकिन सूर्य का स्वाभाविक तेज दृश्यता की बजाय गहराई की ओर जाता है। मनोवैज्ञानिक, शल्य-चिकित्सक, वह अन्वेषक जो सूचना सुरक्षात्मक सावधानी से रखता है — ये सब इस सूर्य की कुछ न कुछ छाप रखते हैं।
मनोवैज्ञानिक अंधेरे को पार करके दृढ़ भावनात्मक गहराई
वृश्चिक में चन्द्रमा नीच है — 3° पर सबसे अधिक क्लासिकल कठिनाई। समझने के लिए सोचिए चन्द्र क्या है: मन की पोषण, सुरक्षा, और कोमल तरलता की ज़रूरत जो भावनात्मक अनुकूलन की अनुमति देती है। वृश्चिक एक स्थिर मंगल-शासित राशि है — तीव्र, रूपांतरकारी, और कोमल लचीलेपन की बजाय पूर्ण प्रतिबद्धता की माँग करती है। क्लासिकल ग्रंथ इस स्थिति की निंदा नहीं करते; वे एक ऐसे चन्द्र का वर्णन करते हैं जो ठीक उसी से लचीलापन विकसित करता है जो वह सहन करता है। नीचभंग की जाँच करें — विशेष रूप से मंगल या बृहस्पति की अच्छी स्थिति। जिस नक्षत्र में चन्द्र है — विशाखा, अनुराधा, या ज्येष्ठा — यह एक महत्त्वपूर्ण परिष्करण है।
3° पर नीच
जड़ तक समझने की जिज्ञासु बुद्धि
वृश्चिक में बुध शत्रु मंगल की राशि में है। बुध की हल्कापन, त्वरित संबंध, और सतह-स्तर के आदान-प्रदान की स्वाभाविक प्रवृत्ति वृश्चिक की स्थिर जल-गहराई से मिलती है — और परिणाम है वह मन जो कोई भी स्पष्टीकरण सतह-मूल्य पर स्वीकार करने से इनकार करता है। ये जातक अनुसंधानकर्ता और अन्वेषक हैं अपने मूल में: वे जड़ स्तर पर समझ चाहते हैं और तब तक नहीं रुकते जब तक मिल नहीं जाती। इस बुध का संचार चयनात्मक और रणनीतिक है — वे सामान्य बुध से कम बोलते हैं, लेकिन जब बोलते हैं सटीकता उनकी पहचान है। छाया: रणनीतिक रोकथाम को उत्पादक बुद्धिमत्ता से भ्रमित करना, और मनोवैज्ञानिक हेरफेर के लिए काफी विश्लेषणात्मक क्षमता का उपयोग।
छिपे ज्ञान का शिक्षक — गहराई और रूपांतरण के दर्शन में ज्ञान
वृश्चिक में बृहस्पति वह उत्पन्न करता है जिसे क्लासिकल ज्योतिष रहस्य-विद्या का शिक्षक बताता है — छिपा ज्ञान। बृहस्पति का विस्तारशील, दार्शनिक स्वभाव गहराई, गुप्त ज्ञान, और रूपांतरण की राशि में ऐसा जातक बनाता है जिसकी मृत्यु, मुक्ति, और सतह के नीचे की वास्तविकताओं के दर्शन के लिए वास्तविक व्यवसाय है। वह परामर्शदाता जो वास्तविक संकट में साथ देता है; वह ज्योतिषी जो स्पष्ट के नीचे पढ़ता है; वह दार्शनिक जो ठीक वहाँ शिक्षण पाता है जहाँ दूसरे केवल हानि पाते हैं — ये सब वृश्चिक-बृहस्पति की अभिव्यक्तियाँ हैं। वृश्चिक लग्न के लिए बृहस्पति दूसरे और पाँचवें (त्रिकोण) का स्वामी — पाँचवें का स्वामित्व इसे इस लग्न का सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक शुभ बनाता है।
प्रेम सामाजिक सामंजस्य की बजाय तीव्रता, गहराई और रूपांतरकारी शक्ति के रूप में
वृश्चिक में शुक्र अपने महान शत्रु की राशि में है, और क्लासिकल ग्रंथ इसे शुक्र की सबसे चुनौतीपूर्ण स्थितियों में से एक मानते हैं। शुक्र के स्वाभाविक गुण — हल्कापन, सामंजस्यपूर्ण आनंद, सुंदरता से संबंधित होने की क्षमता — मंगल-शासित वृश्चिक की स्थिर तीव्रता से दबते हैं। ये जातक प्रेम और इच्छा को ऐसी तीव्रता से अनुभव करते हैं जो शायद ही कभी आकस्मिक हो: संबंध या तो गहरे हैं या कुछ नहीं। इस स्थिति की सकारात्मक अभिव्यक्ति गहन है: कठिनाई से जीवित और गहरी होने वाली भक्ति, कला जो पीड़ा से सौंदर्य बनाती है। चुनौती: ईर्ष्या, अधिकार, और तीव्रता को प्रेम समझ लेना। एक बलवान बृहस्पति यहाँ बहुत लाभकारी है।
दबाव में सहनशक्ति — संरचना का विघटन और बार-बार संकट से पुनर्निर्माण
वृश्चिक में शनि शत्रु की राशि में है — मंगल और शनि ज्योतिष में स्वाभाविक विरोधी हैं। संरचना और अनुशासित सीमा का ग्रह वृश्चिक के स्थिर जल में एक जटिल लेकिन अंततः महत्त्वपूर्ण संयोजन उत्पन्न करता है: शनि वृश्चिक की गहराई से आसानी से नहीं बहता, लेकिन संयोजन असाधारण आंतरिक सहनशक्ति पैदा करता है। ये जातक अक्सर निरंतर दबाव में एक संयम के साथ काम करना सीखते हैं जिसे पर्यवेक्षक शीतलता समझते हैं — वास्तव में यह उस व्यक्ति की सीखी हुई स्थिरता है जिसके पास कोई विकल्प नहीं था। शनि की लग्न से स्थिति — विशेष रूप से वह कार्यात्मक शुभ है या पाप — तय करती है यह सहनशक्ति वास्तविक संपत्ति बनती है या आत्म-आरोपित कठिनाई का पैटर्न।
जुनूनी गहराई — छिपे ज्ञान और रूपांतरकारी अनुभव की अतृप्त भूख
वृश्चिक में राहु सभी वृश्चिक-विषयों को बढ़ाता है: गहराई की ललक, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण, गुप्त ज्ञान, छिपी शक्ति, और रूपांतरकारी अनुभव। राहु की छाया-प्रकृति वृश्चिक की अधोलोक राशि में एक दार्शनिक घर पाती है — दोनों उस स्थान में काम करते हैं जो देखे और छिपे के बीच है। ये जातक अक्सर शक्तिशाली रूप से अन्वेषण क्षेत्रों, गुप्त ज्ञान, मनोवैज्ञानिक शोध, या शक्ति के छिपे आयामों की ओर आकर्षित होते हैं — इन्हें उस तीव्रता से पाते हैं जो बाध्यकारिता में बदल जाती है जब राहु की जाँच नहीं की जाती। सकारात्मक अभिव्यक्ति असाधारण है: निडर अन्वेषण, उस अंधेरे को देखने की क्षमता जिसे दूसरे देखने से मना करते हैं। राहु के लिए कोई स्थिर क्लासिकल गरिमा नहीं — समग्र कुंडली-विश्लेषण अधिक विश्वसनीय।
20° पर नीच। छाया ग्रहों की उच्च-नीच शास्त्रों में विवादित है
अंधकार से जन्मजात विरक्ति — गुप्त ज्ञान बिना प्रयास के
वृश्चिक में केतु को कुछ क्लासिकल परंपराएँ उच्च मानती हैं — दक्षिण नोड की विघटित, मोक्ष-उन्मुख प्रकृति को रूपांतरण, छिपे ज्ञान, और आध्यात्मिक गहराई की राशि के साथ संरेखित करती हैं। ये जातक अक्सर उस चीज़ की जन्मजात, सहज समझ लाते हैं जो दूसरे गुप्त अध्ययन, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण, या आध्यात्मिक संकट के माध्यम से हासिल करने के लिए श्रम करते हैं। चुनौती केतु का मानक शिक्षण है: बिना प्रयास के आने वाले उपहार वे उपहार हैं जो सचेत खेती के बिना नहीं बढ़ते। नोट: केतु के उच्च पर — वृश्चिक या धनु — बहस जारी है।
छाया ग्रहों की उच्च-नीच शास्त्रों में विवादित है
चिकित्सा ज्योतिष
| शरीर के अंग | प्रजनन अंग, श्रोणि क्षेत्र, मूत्राशय, मलाशय, बृहदान्त्र, जनन-तन्त्र |
| सामान्य रोग | प्रजनन विकार, यौन रोग, बवासीर, मूत्राशय समस्याएँ, श्रोणि शोथ, जुनूनी विकार |
| आयुर्वेदिक दोष | पित्त |
| उपचार विधियाँ | विषमुक्ति, श्रोणि स्वास्थ्य, भावनात्मक विमोचन, तान्त्रिक अभ्यास, छाया-कार्य |
चक्र एवं योग
यह चक्र क्यों
वृश्चिक और स्वाधिष्ठान — यह सम्बन्ध उस गहराई को स्पर्श करता है जो वृश्चिक की आत्मा है। स्वाधिष्ठान का अर्थ है — अपना निवास, स्वयं का वह आधार जो चेतन मन के नीचे है। यह अवचेतन का चक्र है, उन संस्कारों का जो दिखते नहीं पर सब कुछ चलाते हैं। और वृश्चिक? वह राशि जो सतह के नीचे क्या है यह देखती है, जो अदृश्य शक्तियों को पहचानती है, जो परिवर्तन और विसर्जन की प्रक्रिया को जीवन का नहीं — जीवन की शर्त मानती है। मंगल — वृश्चिक का स्वामी — प्राण-शक्ति का ग्रह है। और यही प्राण-शक्ति अपने सबसे भौतिक रूप में इच्छा बनती है — और अपने सबसे परिशुद्ध रूप में कुण्डलिनी। दोनों का जन्म कहाँ होता है? स्वाधिष्ठान में। वृश्चिक की छाया — आसक्ति, नियंत्रण, तीव्रता के लिए तीव्रता — ये सब अवरुद्ध स्वाधिष्ठान के लक्षण हैं। और वृश्चिक की महिमा — रूपांतरण, गहन उपचार, आत्म-ज्ञान — यह खुले स्वाधिष्ठान का वरदान है।
रंग का सम्बन्ध
नारंगी रंग — स्वाधिष्ठान का। पर वृश्चिक के लिए यह नारंगी बाहरी नहीं है — यह भीतरी दीप्ति है। जैसे अंगारा — ऊपर से शांत राख, और भीतर से जलती हुई आग। वैदिक वर्ण-चिकित्सा में नारंगी मंगल की ऊर्जा को उत्तेजित करता है, साहस और रूपांतरण की क्षमता को बढ़ाता है, और जल के भीतर अग्नि का वह रसायन जगाता है जो वृश्चिक की पहचान है। ध्यान दीजिए — वृश्चिक जातकों के लिए नारंगी रंग का बाहरी उपयोग कम और ध्यान में उसकी आंतरिक कल्पना अधिक उपयुक्त है। त्रिकास्थि के क्षेत्र में एक गहरे नारंगी प्रकाश की धीमी, स्थिर दीप्ति — यह स्वाधिष्ठान को जागृत करने का सबसे सुरक्षित और सबसे प्रभावशाली मार्ग है।
यह क्या नियंत्रित करता है
स्वाधिष्ठान के अधीन हैं: कामशक्ति और संवेदनशीलता जो प्राण-शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं, अवचेतन का भावनात्मक शरीर और उसमें संग्रहीत संस्कार, वह रचनात्मक प्रवाह जो गहराई से आता है न कि सतह से, संक्रमण और विसर्जन से गुज़रने की इच्छाशक्ति, और सुख-दुःख के बीच का वह मूलभूत सम्बन्ध जो शिक्षक है। वृश्चिक के लिए स्वस्थ स्वाधिष्ठान और अवरुद्ध स्वाधिष्ठान के बीच का अंतर यह है: खुला स्वाधिष्ठान वह तीव्रता देता है जो रूपांतरित करती है। अवरुद्ध स्वाधिष्ठान वह तीव्रता देता है जो भस्म करती है — स्वयं को भी, और दूसरों को भी। वही ऊर्जा, वही शक्ति — केवल प्रवाह की दिशा भिन्न।
बीज मंत्र: VAM (वं)
स्वाधिष्ठान का बीज मंत्र है — वं। इसकी कंपन-आवृत्ति त्रिकास्थि के क्षेत्र में अनुनाद करती है, संचित भावनात्मक संस्कारों को मुक्त करती है, और उस कठोरता को गलाती है जो रुके हुए शोक से बनती है। वृश्चिक जातकों में मंगल की ऊर्जा कभी-कभी नियंत्रण के स्थिर पैटर्न में जम जाती है — और वं उसे प्रवाहित करता है। जप के समय ध्यान त्रिकास्थि पर रखें और प्रत्येक वं के साथ अनुभव करें कि जो कठोर है वह नरम हो रहा है, जो रुका है वह बह रहा है। नियमित वं अभ्यास वृश्चिक के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाता है जहाँ वह अपनी गहराई से मित्रता कर सके — उससे लड़े नहीं।
योग साधना
स्वाधिष्ठान को जागृत करने वाले अभ्यास वृश्चिक जातकों के सबसे गहरे उपचार का द्वार हैं। नितम्ब-खोलने वाले आसन — एक पाद राजकपोतासन, बद्धकोणासन — श्रोणि-क्षेत्र को, जहाँ स्वाधिष्ठान निवास करता है, मुक्त करते हैं। जल-तत्त्व का ध्यान — प्रवाहित नदी या समुद्र की कल्पना — उन स्थिर भावनात्मक पैटर्नों को गलाता है जो वृश्चिक में जमा होते हैं। त्राटक — दीपक की लौ को एकाग्र दृष्टि से देखना — अग्नि और जल दोनों का सम्मिलन है, जो वृश्चिक की विशेष साधना है। और वह कार्य जो योग-चटाई पर नहीं होता — छाया-कार्य, गहन मनोवैज्ञानिक आत्म-अन्वेषण — वृश्चिक के स्वाधिष्ठान के लिए सबसे प्रत्यक्ष उपाय है। जो अपने अवचेतन से भागता नहीं, जो अपनी गहराई में उतरने का साहस करता है — उसका स्वाधिष्ठान स्वाभाविक रूप से खुलता है।
उच्चतम शिक्षा
स्वाधिष्ठान की वृश्चिक को उच्चतम शिक्षा है — ब्रह्मचर्य। पर यह अर्थ वह नहीं जो सामान्यतः समझा जाता है। ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है: ब्रह्म में चरण — ब्रह्म की ओर चलना। यानी मंगल-स्वाधिष्ठान की शक्ति को क्षैतिज दिशा में — बाहरी संसार में, इच्छा की वस्तुओं की ओर — नहीं, ऊर्ध्व दिशा में — भीतर और ऊपर, कुण्डलिनी के रूप में — प्रवाहित करना। वही वृश्चिक जो बिच्छू है वह गरुड़ बन सकता है। वही विष जो अमृत बन सकता है। यह वृश्चिक का राशिचक्रीय वादा है: जो ऊर्जा अपरीक्षित रहे तो आसक्ति और विनाश बनती है — वही ऊर्जा जब सचेत रूप से ऊपर की ओर मोड़ी जाए, तो पूरे राशिचक्र की सबसे शक्तिशाली रूपांतरकारी शक्ति बन जाती है।
अनुकूलता
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तटस्थ
चुनौतीपूर्ण
रत्न एवं उपाय
यहाँ दिया गया रत्न वृश्चिक के स्वामी ग्रह मंगल पर आधारित है। रत्न चिकित्सा एक शक्तिशाली उपाय है — गलत रत्न पहनने से असंतुलन बढ़ सकता है, घट नहीं सकता। उचित सिफारिश के लिए आपके लग्न, लग्नेश, वर्तमान दशा और सम्पूर्ण कुंडली बल का विश्लेषण आवश्यक है। संदेह हो तो — पहनने से पहले परामर्श लें।
| रत्न | मूँगा (लाल प्रवाल) |
| वैकल्पिक रत्न | ब्लडस्टोन, गार्नेट |
| धारण दिवस | मंगलवार |
| धारण अंगुली | अनामिका |
| रंग | गहरा लाल |
| अन्य रंग | मैरून, काला, गहरे रंग |
उपचार और अभ्यास
मंगलवार व्रत (मंगलवार व्रत)
मंगलवार मंगल का दिन है — वृश्चिक का स्वामी ग्रह।
क्या खाएँ
मीठे खाद्य पदार्थ: गुड़, गेहूँ का हलवा, मीठी दाल। मसूर की दाल सादी।
क्या न खाएँ
नमक, तीखे खाद्य पदार्थ, माँस, और नशीले पदार्थ।
देवता पूजा
हनुमान, कार्तिकेय (मुरुगन), काली
मंगल दान (मंगल-चैरिटी)
मंगलवार को मंगल को समर्पित दान।
क्या दें
- मसूर की दाल
- लाल वस्त्र
- लाल फूल
- ताँबे के बर्तन या सिक्के
- गेहूँ का आटा
- गुड़
- मूँगा या लाल रत्न
- रक्त-दान
किसे दें
- योद्धा और सैनिक
- युवा पुरुष और लड़के
- हनुमान और कार्तिकेय मंदिर
- शस्त्र-क्रिया से उबर रहे लोग
- अग्निशमन केंद्र और आपातकालीन सेवाएँ
मंगल वर्ण-चिकित्सा
मंगल के रंग लाल, गहरा मरून, और ताँबे-नारंगी हैं।
प्राथमिक रंग
गहरा लाल, मरून, मूँगा, ताँबा
बलवान करने के लिए
मंगलवार को लाल या ताँबे के टोन पहनें। ताँबे के आभूषण लाभकारी।
शांत करने के लिए
गहरा नीला, इंडिगो, और समुद्री टोन शीतल जल-तत्त्व प्रदान करते हैं।
सीमित करने योग्य रंग
बहुत हल्के, धुले हुए रंग, अत्यधिक काला जो राहु-छाया को बलवान करता है
मंगल के खाद्य और औषधि
मंगल ताप, रक्त, माँसपेशी-तंत्र का स्वामी है।
लाभकारी
- प्रोटीन-युक्त दालें, विशेषतः मसूर
- हल्दी
- अनार
- चुकंदर
- गेहूँ और जटिल कार्बोहाइड्रेट
- ताँबे के बर्तन में रखा पानी
औषधियाँ
- अश्वगंधा
- शतावरी
- नीम
- हल्दी
- गुग्गुल
संयम से खाएँ
- अत्यधिक ताप-उत्पादक खाद्य पदार्थ
- मदिरा
- अत्यधिक अम्लीय खाद्य पदार्थ
पौराणिक कथा एवं देवता
| देवता | मंगल देव |
| सम्बन्धित देवता | काली, यमराज, शिव (संहारक रूप में), वराह |
मंत्र एवं ध्वनि
| बीज मंत्र | ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः |
| गायत्री मंत्र | ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् |
| सरल मंत्र | ॐ मंगलाय नमः |
पौराणिक कथा
कथा
देवी भागवत पुराण में महाकाली का शिव के शव पर नृत्य का वर्णन है — विघटन और रूपान्तरण की देवी शुद्ध चेतना की स्थिरता पर खड़ी हैं। यह चित्र वृश्चिक के विरोधाभास को पकड़ता है: सर्वाधिक तीव्र गतिविधि (मंगल) और सबसे आमूल स्थिरता (अहंकार की मृत्यु) की राशि। वृश्चिक का विष केन्द्रीय शिक्षा है। आयुर्वेदिक और तान्त्रिक ग्रन्थों में विष और अमृत एक ही पदार्थ के दो पहलू माने गए हैं — अन्तर केवल मात्रा, तैयारी और ग्रहण करने वाले की तैयारी में है। वृश्चिक की तीव्रता भी यही है: जो शक्ति एक अपरिपक्व मन को अभिभूत कर देती है, वही एक परिपक्व को मुक्त करती है। समुद्र मन्थन — जिसमें अमृत से पहले हलाहल निकला — यही वृश्चिक का पाठ है: रूपान्तरण हमेशा उसी से गुज़रता है जिससे सबसे अधिक भय हो। शिव ने हलाहल को कण्ठ में धारण कर विनाश को रक्षा में बदला — यही वृश्चिक की आत्मा है।
प्रतीकवाद
वृश्चिक औषधि-रूप में विष का प्रतीक है — वह क्षमता जो जो अब सेवा नहीं करता उसे विसर्जित करे, अन्धकार में काम करने की तैयारी, और मेरुदण्ड के मूल में कुण्डित कुण्डलिनी शक्ति — वह सुप्त बल जो ठीक से जागने पर ज्ञान बनकर प्रत्येक चक्र से ऊपर उठता है। कुछ परम्पराओं में वृश्चिक का गहरा प्रतीक गरुड़ है — वह वृश्चिक जिसने उड़ना सीख लिया, वही तीव्रता क्षैतिज की जगह ऊर्ध्व दिशा में।
मंगल एवं महाकाली — वृश्चिक का आदर्श
मंगल वृश्चिक पर अपने रात्रिकालीन स्वक्षेत्र के रूप में शासन करता है — मंगल की ऊर्जा का जल-तत्व रूप, जहाँ बल बाहर नहीं, भीतर मुड़ता है। महाकाली — काल, रूपान्तरण और अहंकार के विघटन की देवी — वृश्चिक की गहरतम अभिव्यक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे विवेक की तलवार और मिथ्या का कटा हुआ शीश धारण करती हैं। मंगल और काली मिलकर इस राशि का मूल कार्य स्थापित करते हैं: जो असत्य है उसका नाश करना ताकि जो सत्य है वह प्रकट हो सके।
जीवन की शिक्षा
विनाशकारी शक्ति को उपचार में बदलना; यह समझना कि जो आपके बारे में सबसे अधिक भयावह लगता है वहाँ प्राय: आपकी सबसे बड़ी सम्भावना छुपी है; और यह स्वीकार करना कि कुछ चीज़ें संरक्षित नहीं हो सकतीं — केवल किसी अधिक बुद्धिमान वस्तु में रूपान्तरित हो सकती हैं।
वृश्चिक संक्रान्ति
यह क्या है
वृश्चिक संक्रान्ति — सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश — प्रतिवर्ष १६-१७ नवम्बर को होता है। सूर्य तुला से निकलकर वृश्चिक में आता है, दक्षिणायन के और गहरे में उतरता है। उत्तरी गोलार्ध में दिन अब रातों से छोटे हैं। और सूर्य अपने उच्चांश बिंदु — मेष में — से दूर जाता हुआ अपने वार्षिक चाप के निचले हिस्से में है। कार्तिक और दीवाली की उजास अब पीछे छूट चुकी है। पर्व का बाज़ार शान्त हो गया है। और यही वृश्चिक संक्रान्ति का वास्तविक निमंत्रण है — वह शान्ति, वह खिंचाव, वह अंदर की ओर।
इस राशि में क्यों
वृश्चिक का सौर मास मार्गशीर्ष के साथ मेल खाता है — वह मास जिसे स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में सम्मान दिया है। कहा है: 'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्' — महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ (अध्याय १०.३५)। यह वह मास है जब साधना गहरी होती है, जब पर्व-पंचांग का शोर थम जाता है और निमंत्रण अंतर्मुखी होता है। तमिलनाडु में कार्तिगाई दीपम् — सूर्यास्त के बाद दीप जलाकर शिव के अनन्त प्रकाश-स्तम्भ का सम्मान — वृश्चिक मास को शिव-काली के अष्टतत्त्व से जोड़ता है। गुरु नानक जयन्ती — उस महान गुरु का सम्मान जिन्होंने ऐतिहासिक अंधकार के काल में ज्ञान का प्रकाश लाया — इसी मास में है। और कृषि-पंचांग में यह फ़सल काटने और संचित करने का समय है — वृश्चिक के अंतरिक फ़सल-संग्रह का बाहरी दर्पण।
पुण्य काल
वृश्चिक संक्रान्ति का पुण्यकाल दक्षिणायन के गहराने की विशेष गुणवत्ता लिए है। सूर्य के प्रवेश के आसपास की १६ घटियाँ विशेष रूप से शक्तिशाली हैं: पितृ-तर्पण के लिए — पितृ पक्ष की अनुष्ठान-श्रृंखला का विस्तार इस मास में भी होता है, शिव और काली को अर्पण के लिए — जिनका रूपान्तरण-सिद्धांत इस मास के अंतर्मुखी गुण को शासित करता है, और जप तथा ध्यान-अभ्यासों के तीव्रीकरण के लिए। बात यह है कि — वृश्चिक के सौर मास में बाहरी प्रकाश का जो मंदन होता है, वह ठीक उस गहराई के अनुरूप है जो अंतर्कार्य के लिए उपलब्ध होती है। मंत्र, ध्यान और प्रत्याहार — इस प्रवेश-खिड़की और पूरे वृश्चिक सौर मास में — अधिक भेदन-शक्ति से काम करते हैं। अंधकार में रखा बीज रूपान्तरित होता है — यही इस संक्रान्ति का मूल निमंत्रण है।
अनुष्ठान एवं पालन
वृश्चिक संक्रान्ति की पारम्परिक आचार-परम्पराएँ: सूर्योदय से पूर्व स्नान और जल-अर्पण जो दक्षिणायन के गहराने को स्वीकार करे। शिव मन्दिर के दर्शन और कार्तिगाई दीपम् की परम्परा में सूर्यास्त के बाद तेल के दीप जलाना। गुरु नानक जयन्ती पर गुरु-सिद्धांत का सम्मान — चिंतन और दान के माध्यम से। क्षेत्र के अनुसार उचित फ़सल-संस्कार। और आगे आने वाले मार्गशीर्ष मास के लिए जप-साधना का आरम्भ या तीव्रीकरण। ध्यान दीजिए — वृश्चिक के छोटे दिन जो बाहरी उत्तेजना का अभाव देते हैं, वह स्वयं इस संक्रान्ति की शिक्षा है: यह वह मास है जब साधक केवल परिस्थितिवश नहीं — संकल्पपूर्वक भीतर मुड़ता है।
ज्योतिष विद्यार्थी के लिए
वृश्चिक सौर मास प्रत्याहार के अभ्यास का निमंत्रण देता है — पतंजलि के योग-सूत्रों में वर्णित अष्टांग के पाँचवें अंग का, इन्द्रियों का बाहरी विषयों से संकेतित प्रत्यावर्तन। जैसे-जैसे दिन सिकुड़ते हैं और अंधकार विस्तरित होता है, बाहरी जगत कम उत्तेजना देता है और अंतर्जीवन अधिक स्पष्ट होता है। यह अंधकार अभाव के रूप में नहीं — उपस्थिति के रूप में है। वही अंधकार जो बीज को भूमि के नीचे वसन्त से पहले रूपान्तरित करता है। वृश्चिक संक्रान्ति यह सिखाती है कि जिन कालों को हम क्षीणता के रूप में अनुभव करते हैं, वे प्रायः सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर्कार्य के काल होते हैं। और ज्योतिष के विद्यार्थी के लिए एक संरचनात्मक शिक्षा: मंगल और केतु — वृश्चिक के स्वामी — दोनों को भेदन और रूपान्तरण से जोड़ा जाता है। वृश्चिक का सौर मास उसी भेदन-शक्ति को आमंत्रित करता है, अंतर्जगत में।
वृश्चिक लग्न के रूप में
वृश्चिक लग्न का जातक
जब जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर वृश्चिक राशि उदय हो रही हो — तो इस कुंडली का अधिपति मंगल है। लग्नेश मंगल। और वृश्चिक लग्न में मंगल का स्वरूप मेष लग्न के मंगल से भिन्न है — यहाँ मंगल की जल-प्रकृति है, उसकी गहराई है, वह प्रत्यक्ष नहीं — अन्तर्मुखी है। वृश्चिक का मंगल नहीं चिल्लाता, नहीं दौड़ता — वह देखता है, प्रतीक्षा करता है, और जब आता है तो पूरी शक्ति के साथ आता है। यह वह लग्न है जहाँ शक्ति छिपी रहती है — सतह पर नहीं दिखती, पर भीतर अटूट होती है। स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक गहराई, रूपांतरण की क्षमता, और जीवन की गुप्त परतों से संबंध — सब कुछ मंगल की स्थिति और बल से तय होता है। लग्नेश मंगल लग्न के साथ-साथ षष्ठ भाव का भी स्वामी है — शत्रु, रोग, सेवा, और प्रतिस्पर्धा का भाव। इसका अर्थ यह है कि वृश्चिक लग्न के जातक का व्यक्तित्व और उसके जीवन की चुनौतियाँ एक ही धागे से बंधी हैं — यह वह लग्न है जो संघर्ष से डरता नहीं, बल्कि संघर्ष ही इसकी पहचान को गहरा करता है।
वृश्चिक लग्न के जातक को देखते ही मंगल की जल-छाप महसूस होती है — एक सुगठित और प्रायः सघन काया जिसमें एक विचित्र चुम्बकत्व है जो समझाया नहीं जा सकता पर महसूस होता है, आँखें जो भेदती हों — जैसे वे केवल देख नहीं रहीं, जाँच रही हों, एक उपस्थिति जो कमरे में प्रवेश करते ही शक्ति-केंद्र बन जाए, और एक संयमित मुस्कान जिसके पीछे गहरी जागरूकता है। ये वे लोग हैं जो कम बोलते हैं पर जो बोलते हैं वह अक्सर निर्णायक होता है। भेद — किसी भी स्थिति का, किसी भी व्यक्ति का — पढ़ने की एक नैसर्गिक क्षमता होती है जो इन्हें जन्म से मिली होती है। यही इनकी सबसे बड़ी शक्ति है — और यही इनकी सबसे परिचित पीड़ा भी, क्योंकि जो हर बात की तह तक जाता है, वह कभी-कभी उस तह में इतना उतर जाता है कि वापस आना भारी लगता है। गुप्तांग, मूत्राशय, और श्रोणि-प्रदेश इस लग्न के शारीरिक संवेदनशील क्षेत्र हैं — और मंगल के लग्नेश होने के नाते जो ऊर्जा बाहर नहीं निकली, वह शरीर में उतरती है।
किसी भी ज्योतिषी का पहला प्रश्न जब वृश्चिक लग्न की कुंडली देखे — तीन ग्रह एक साथ देखने चाहिए: मंगल (लग्नेश) कहाँ है, गुरु (श्रेष्ठ शुभकारक) कहाँ है, और चन्द्रमा (नवमेश) कहाँ है। ये तीन ग्रह मिलकर इस कुंडली की दिशा, गहराई, और भाग्य — सब कुछ निर्धारित करते हैं।
भाव स्वामित्व
♂मंगल — प्रथम एवं षष्ठ भाव▸
मंगल लग्न (स्वयं, शरीर, और जीवन की समग्र दिशा) और षष्ठ भाव (शत्रु, ऋण, रोग, सेवा, और प्रतिस्पर्धा) — दोनों का स्वामी है। यह संयोग वृश्चिक लग्न की सबसे महत्त्वपूर्ण ज्योतिषीय वास्तविकता है: इन जातकों का व्यक्तित्व और उनकी जीवन-चुनौतियाँ एक ही ग्रह से शासित हैं। इसका अर्थ यह है कि वृश्चिक लग्न के जातक संघर्ष से दूर नहीं भाग सकते — संघर्ष उनकी पहचान का हिस्सा है। पर इसीलिए ये वे लोग भी हैं जो संघर्ष में सबसे अधिक जीवंत हो जाते हैं। मंगल बलवान हो — अपनी राशि में, उच्च मकर में, या शुभ दृष्टि से युक्त — तो षष्ठ की चुनौतियाँ इस जातक को तोड़ती नहीं, उसे और धारदार बनाती हैं। मंगल पीड़ित हो — तो न केवल स्वास्थ्य और शत्रु-पक्ष से कठिनाई आती है, जातक का आत्म-बोध भी अस्थिर हो जाता है। देखिए — वृश्चिक लग्न की कुंडली में मंगल को देखना पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम है।
♃गुरु — द्वितीय एवं पंचम भाव▸
गुरु वृश्चिक लग्न का सर्वाधिक शुभकारक ग्रह है — पंचमेश (बुद्धि, सृजन, संतान, पूर्व कर्म की कृपा, मंत्र-सिद्धि) और द्वितीयेश (धन, परिवार, वाणी) के रूप में। पंचम त्रिकोण का स्वामित्व गुरु को इस कुंडली का सबसे विशेष ग्रह बनाता है। गुरु महादशा वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए — जब नाटल गुरु बलवान और अपीड़ित हो — प्रायः जीवन का सर्वाधिक ज्ञान-समृद्ध और सृजनात्मक काल होती है: बौद्धिक उत्कर्ष, आर्थिक विकास, परिवार-विस्तार, और उस गहरी आध्यात्मिक बुद्धि का जागरण जो वृश्चिक की तीव्रता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति में बदल देती है। द्वितीय का सह-स्वामित्व वाणी को प्रभावशाली और धन-संचय को स्वाभाविक बनाता है। यहाँ एक गहरी बात यह भी है: गुरु मंगल का स्वाभाविक मित्र है — लग्नेश और पंचमेश की यह मित्रता वृश्चिक लग्न के लिए एक आंतरिक सामंजस्य बनाती है जो बाहर से नहीं दिखती पर भीतर से कुंडली को सहारा देती है।
☽चन्द्र — नवम भाव▸
चन्द्रमा नवमेश है — धर्म, भाग्य, पिता, गुरु, उच्च ज्ञान, दीर्घ-यात्राएँ, और पूर्व जन्मों के कर्मों की कृपा का भाव। नैसर्गिक शुभ ग्रह सबसे शुभ त्रिकोण का स्वामी हो — यह वृश्चिक लग्न की कुंडली का सबसे बड़ा भाग्य-संकेत है। चन्द्र दशा वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए — जब नाटल चन्द्रमा बलवान और शुक्ल पक्ष में हो — भाग्य-द्वार, उच्च ज्ञान, पिता और गुरु से अनुग्रह, और धर्मसम्मत यात्राओं का काल होती है। यहाँ एक सूक्ष्म पर महत्त्वपूर्ण बात: चन्द्रमा वृश्चिक राशि में नीच होता है (३ अंश पर पराकाष्ठा)। इसलिए यदि जन्मकुंडली में चन्द्रमा वृश्चिक राशि में हो — लग्न में — तो वह नीच का नवमेश है। नीचभंग की शर्तें पूरी हों तो यह स्थिति भी परिणामकारी हो सकती है — पर इसका आकलन कुंडली की समग्र संरचना देखकर ही करना उचित है। बलवान, शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा इस लग्न के लिए जो उपहार लाता है — वह मंगल की गहराई को एक भावनात्मक और धार्मिक आयाम देता है जो इस कुंडली का सर्वोत्कृष्ट रूप है।
♀शुक्र — सप्तम एवं द्वादश भाव▸
शुक्र वृश्चिक लग्न के लिए सप्तमेश (विवाह, साझेदारी, खुले शत्रु, सार्वजनिक व्यवहार) और द्वादशेश (व्यय, विदेश, छिपे शत्रु, मोक्ष) है। सप्तम का स्वामित्व शुक्र को मारक की श्रेणी में रखता है। यहाँ ज्योतिष का एक रोचक विरोधाभास है: शुक्र — जो प्रेम और सौंदर्य का ग्रह है — वृश्चिक लग्न के लिए एक जटिल ग्रह बन जाता है। जीवनसाथी या प्राथमिक साझेदार शुक्र के गुणों वाला होता है — सौंदर्यप्रिय, कलात्मक, सामाजिक — और मंगल की तीव्रता से स्वभावतः भिन्न। वृश्चिक का गहरापन और शुक्र की कोमलता का यह विवाह-अक्ष इस लग्न की सबसे जटिल और सबसे रोचक जीवन-परीक्षा है। द्वादश का सह-स्वामित्व शुक्र को एक आध्यात्मिक और विदेश-संबंधी आयाम भी देता है। शुक्र और मंगल ज्योतिष के नैसर्गिक युगल हैं — पर वृश्चिक लग्न में यह युगल विवाह-भाव में और अधिक जटिल हो जाता है।
☿बुध — अष्टम एवं एकादश भाव▸
बुध अष्टमेश (रूपांतरण, छिपी बाधाएँ, आयु, गुप्त ज्ञान, अचानक परिवर्तन) और एकादशेश (लाभ, इच्छापूर्ति, सामाजिक नेटवर्क) है। अष्टम का स्वामित्व बुध को वृश्चिक लग्न के लिए एक जटिल ग्रह बनाता है — नैसर्गिक शुभ ग्रह होने के बावजूद अष्टम का भार उसकी शुभता को संकुचित करता है। बुध दशा में वृश्चिक लग्न के जातकों को अचानक परिवर्तन, छिपी जटिलताएँ, और जीवन की अप्रत्याशित उथल-पुथल — एकादश के लाभ के साथ — आ सकती है। एकादश का सह-स्वामित्व यह जोड़ता है कि बुध-काल में आर्थिक लाभ और सामाजिक नेटवर्क के विस्तार की संभावना भी है — पर अष्टम के विषय पहले आते हैं, एकादश का फल बाद में। एक विशेष बात: वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए बुध की अष्टमेश भूमिका गुप्त ज्ञान और अनुसंधान की स्वाभाविक अभिरुचि देती है — रहस्य, मनोविज्ञान, और जीवन की छिपी परतों में प्रवेश करने की क्षमता।
☉सूर्य — दशम भाव▸
सूर्य दशमेश है — करियर, यश, धर्माचरण, सार्वजनिक जीवन, और समाज में स्थान का सबसे महत्त्वपूर्ण भाव। नैसर्गिक तमोगुणी ग्रह दशम केंद्र का स्वामी हो — यह प्रायः शुभ संयोग है। दशम सूर्य का प्राकृतिक घर भी है — इसलिए सूर्य यहाँ अपेक्षाकृत सहज होता है। सूर्य दशा वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए करियर में दृश्यता, सार्वजनिक पहचान, और व्यावसायिक अधिकार का काल होती है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात: मंगल और सूर्य परस्पर मित्र हैं — लग्नेश और दशमेश की यह मित्रता वृश्चिक लग्न के करियर को एक नैसर्गिक बल देती है। जब दोनों बलवान हों — तो इस लग्न का जातक व्यावसायिक जीवन में वह शक्ति और अधिकार प्राप्त करता है जो मंगल की गहराई और सूर्य की दिशा — दोनों से मिलकर बनता है। सूर्य-काल में पिता से संबंध, शासकीय मान्यता, और सार्वजनिक यश के विषय विशेष रूप से सक्रिय होते हैं।
♄शनि — तृतीय एवं चतुर्थ भाव▸
शनि वृश्चिक लग्न के लिए तृतीयेश (साहस, परिश्रम, संचार, छोटे भाई-बहन) और चतुर्थेश (घर, माता, संपत्ति, वाहन, भावनात्मक आधार) है। नैसर्गिक पापग्रह चतुर्थ केंद्र का स्वामी हो — केंद्राधिपति दोष का विपरीत रूप यहाँ लागू होता है: पापग्रह के लिए केंद्र-स्वामित्व उसकी पापता को कुछ कम करता है। व्यावहारिक रूप से, चतुर्थेश शनि यह कहता है कि घर, संपत्ति, और माता से संबंध में शनि की प्रकृति — विलंब, गंभीरता, और ज़िम्मेदारी — काम करती है। गृह-निर्माण या संपत्ति-अर्जन समय लेता है पर टिकाऊ होता है। तृतीय का सह-स्वामित्व परिश्रम और साहस को शनि की धैर्यपूर्ण शैली में रंगता है — ये जातक तुरंत नहीं कहते, पर जो कहते हैं वह दीर्घकालिक होता है। शनि दशा में मकान, वाहन, और भावनात्मक सुरक्षा के विषय — चाहे चुनौती के रूप में आएँ या उपलब्धि के रूप में — नाटल शनि की स्थिति पर निर्भर करते हैं।
योगकारक एवं प्रमुख ग्रहीय सम्बन्ध
वृश्चिक लग्न में कोई शास्त्रीय योगकारक नहीं है। योगकारक के लिए एक ग्रह को अलग-अलग भावों से एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामित्व चाहिए — और वृश्चिक में ऐसा कोई ग्रह नहीं जो यह शर्त पूरी करता हो। मंगल लग्नेश है — लग्न एक साथ केंद्र और त्रिकोण है, पर लग्नेश को अलग वर्ग में रखा जाता है। गुरु पंचम और अष्टम का स्वामी है — पंचम त्रिकोण है, पर अष्टम केंद्र नहीं।
विद्यार्थी के लिए यह शिक्षा महत्त्वपूर्ण है: योगकारक की उपाधि न होना कमज़ोरी नहीं। गुरु वृश्चिक लग्न का सर्वाधिक शुभकारक ग्रह है — पंचमेश के रूप में। पंचम भाव त्रिकोण है — बुद्धि, सृजन, संतान, मंत्र-सिद्धि, और पूर्व जन्मों की कर्मकृपा का भाव। जो ग्रह पंचम का स्वामी हो, वह अपनी दशा में इस समस्त शुभता का वाहक बनता है। गुरु महादशा वृश्चिक लग्न के लिए — जब नाटल गुरु बलवान हो — प्रायः जीवन की सर्वाधिक ज्ञान-समृद्ध और सृजनात्मक अवधि होती है।
गुरु से परे, चन्द्रमा नवमेश के रूप में वृश्चिक लग्न का दूसरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण शुभ ग्रह है। नवम भाव — धर्म, भाग्य, पिता, गुरु, और उच्च ज्ञान का भाव — त्रिकोण है, और चन्द्रमा जैसा नैसर्गिक शुभ ग्रह इसका स्वामी हो तो दशा में नवम के सभी उपहार एक साथ आते हैं। एक और गहरी बात: मंगल और चन्द्रमा एक-दूसरे के मित्र नहीं हैं — पर वृश्चिक लग्न की कुंडली में लग्नेश मंगल और नवमेश चन्द्रमा का संबंध इस लग्न की सबसे महत्त्वपूर्ण कुंजी है। जब दोनों एक-दूसरे को शुभ दृष्टि से देखें या शुभ भावों में हों — तो यह कुंडली का सबसे उत्कृष्ट रूप है: मंगल की गहराई और चन्द्रमा की अनुभूति — एक साथ।
व्यावहारिक शिक्षा यह है: वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए गुरु और चन्द्रमा — दोनों की नाटल स्थिति उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी लग्नेश मंगल की। तीनों बलवान हों तो यह लग्न अपना सर्वोच्च रूप प्रकट करता है: तीव्र, गहरा, रूपांतरणकारी — और साथ ही ज्ञान, भाग्य, और करुणा से भरा।
जीवन के प्रमुख विषय
मंगल की तीव्रता — योग्य मिशन की अनिवार्यता
मंगल लग्नेश है और षष्ठेश भी — इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि वृश्चिक लग्न के जातकों की ऊर्जा को एक योग्य मिशन चाहिए, वरना वह ऊर्जा भीतर ही भीतर जलती रहती है। ये वे लोग नहीं हैं जो आधे-अधूरे उद्देश्यों से संतुष्ट हो जाएँ — इनके लिए कार्य का अर्थ और गहराई उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी उसकी सफलता। जो वृश्चिक लग्न के जातक एक ऐसा मिशन खोज लेते हैं जिसमें मंगल की तीव्रता पूरी तरह से लग सके — जाँच, रहस्योद्घाटन, उपचार, परिवर्तन, या किसी भी क्षेत्र में गहरी खुदाई — वे एक ऐसी जीवन-शक्ति तक पहुँचते हैं जो साधारण नहीं है। जो इस ऊर्जा को बिना दिशा के छोड़ देते हैं — वह ऊर्जा स्वयं को ही जलाने लगती है: अत्यधिक नियंत्रण, संदेह, या शारीरिक-मानसिक तनाव के रूप में। वृश्चिक लग्न का सबसे बड़ा जीवन-प्रश्न यही है: मेरी तीव्रता किस दिशा में जा रही है?
गुरु — ज्ञान की लौ जो मंगल की अँधेरी गहराई को रोशन करे
गुरु पंचमेश है — और वृश्चिक लग्न के लिए गुरु का उपहार विशेष रूप से गहरा है। मंगल की जल-प्रकृति — अंतर्मुखी, भेदक, रहस्यों की खोज में लगी हुई — जब गुरु के ज्ञान और दर्शन से जुड़ती है, तो एक ऐसी बुद्धि बनती है जो न केवल छिपे विषयों को समझती है, बल्कि उन्हें बोध और करुणा के साथ देखती है। बिना गुरु के, वृश्चिक की गहराई कभी-कभी केवल अंधकार में उतरती है — रहस्य के लिए, नियंत्रण के लिए। गुरु के साथ, वही गहराई ज्ञान में रूपांतरित होती है — चिकित्सा, अनुसंधान, मनोविज्ञान, आध्यात्मिक गुरुता। जो वृश्चिक लग्न के जातक अपने जीवन में गुरु की ज्ञान-धारा को — नियमित अध्ययन, किसी गुरु का सान्निध्य, या किसी दर्शन की गहरी साधना — सचेत रूप से विकसित करते हैं, वे पाते हैं कि मंगल की ऊर्जा और गुरु का ज्ञान मिलकर एक असाधारण मानवीय उपस्थिति बनाते हैं।
शुक्र सप्तमेश — विवाह-अक्ष की अनिवार्य परीक्षा
सप्तम भाव (वृषभ राशि) शुक्र के आधीन है — और शुक्र मंगल का शास्त्रीय शत्रु। वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए विवाह और प्राथमिक साझेदारी एक ऐसी जीवन-परीक्षा है जो टाली नहीं जा सकती। जीवनसाथी प्रायः शुक्र के गुणों वाला होता है — कोमल, सौंदर्यप्रिय, सामाजिक, और वृश्चिक की तीव्रता से स्वभावतः भिन्न। यह भिन्नता इस संबंध की सबसे बड़ी चुनौती है — और संभावित रूप से इसकी सबसे बड़ी शक्ति भी। वृश्चिक की गहराई और शुक्र की कोमलता जब परस्पर सम्मान से मिलती हैं — तो यह संबंध असाधारण रूप से परिपूर्ण हो सकता है। जब वृश्चिक की नियंत्रण-प्रवृत्ति और शुक्र की स्वतंत्रता-चाह आपस में टकराती हैं — तो यही अक्ष सबसे बड़े संघर्ष का केंद्र बन जाता है। जो जातक यह समझ लेते हैं कि विवाह उनके लिए एक कार्मिक दर्पण है — जो वह दिखाता है जो स्वयं में अभी अविकसित है — वे इस अक्ष को अपने जीवन की सबसे बड़ी आत्मिक शाला बना लेते हैं।
चन्द्र नवमेश — धर्म और भाग्य की धारा
चन्द्रमा नवमेश है — और यह वृश्चिक लग्न की सबसे सुखद ज्योतिषीय वास्तविकता है। वह लग्न जो बाहर से सबसे कठिन, सबसे रहस्यमय, सबसे अंधकारमय दिखता है — उसके भाग्य का स्वामी चन्द्रमा है: संवेदनशीलता, करुणा, और भावनात्मक बुद्धि का ग्रह। इसका गहरा संदेश यह है: वृश्चिक लग्न के जातकों का सर्वोच्च भाग्य तब खुलता है जब वे अपनी कठोर बाहरी सतह के नीचे की संवेदनशीलता को — जिसे वे अक्सर छिपाते हैं — स्वीकार कर लेते हैं। धर्म का मार्ग इनके लिए केवल शक्ति का मार्ग नहीं — करुणा का मार्ग भी है। चन्द्र दशा में भाग्य-द्वार खुलता है: यात्राएँ, गुरु-मिलन, पिता का आशीर्वाद, और उस धार्मिक बोध का जागरण जो मंगल की तीव्रता को एक विशाल उद्देश्य से जोड़ देता है। जो वृश्चिक लग्न के जातक मंगल की शक्ति और चन्द्रमा की करुणा — दोनों को एक साथ जीना सीख लेते हैं, वे इस लग्न का सबसे दुर्लभ और सबसे सुंदर रूप प्रकट करते हैं।
उच्च-नीच एवं बल
| नीच राशि | चन्द्र — 3° |
मुहूर्त (शुभ समय)
अनुकूल
प्रतिकूल
शुभ
उपयुक्त व्यवसाय
मनोविज्ञान एवं मनोचिकित्सा
वृश्चिक रहस्य का घर है — आठवें भाव की राशि। और मनुष्य के मन की गहराइयाँ — उसके दमित भय, उसकी छिपी आकांक्षाएँ, उसके अचेतन के अँधेरे कोने — यही आठवें भाव का मनोवैज्ञानिक संसार है। वृश्चिक जातक इस संसार में जाने से नहीं हिचकता। ज्येष्ठा नक्षत्र — इंद्र देवता की, परिपक्वता और वरिष्ठता की नक्षत्र — वह मनोचिकित्सक बनाती है जो रोगी की सबसे कठिन परतों में भी अपना केंद्र नहीं खोता। अनुराधा — मित्रता और समर्पण की नक्षत्र — वह दीर्घकालिक चिकित्सीय संबंध देती है जिसमें विश्वास धीरे-धीरे बनता है। ध्यान दीजिए — वृश्चिक मनोचिकित्सक अपने रोगी के अँधेरे से डरता नहीं क्योंकि वह अपना अँधेरा पहले से जानता है।
शल्य चिकित्सा एवं चिकित्सा
मंगल शस्त्र के कारक हैं — और वृश्चिक मंगल की स्थिर राशि है। मेष का मंगल आग्नेय है, त्वरित है। वृश्चिक का मंगल गहरा है, एकाग्र है, निरंतर है। शल्य चिकित्सा में यही चाहिए: घंटों तक वही एकाग्रता, वही स्थिरता। ज्येष्ठा — अंतिम ज्ञान की नक्षत्र — वह अनुभव देती है जो कठिन से कठिन शल्य क्रिया में भी निर्णय-क्षमता बनाए रखे। वृश्चिक का आठवाँ भाव-स्वभाव मृत्यु के निकट काम करने की वह मनोवैज्ञानिक स्थिरता देता है जो अन्य राशियों के लिए अर्जित करना कठिन है। ये जन्मजात चिकित्सक हैं — न केवल प्रशिक्षण से, बल्कि इसलिए कि इनका स्वभाव ही गहराई में उतरने का है।
शोध एवं जाँच-पड़ताल
वृश्चिक सतह से संतुष्ट नहीं होता — यह इसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और कभी-कभी सबसे बड़ी चुनौती भी। शोध इसी असंतोष का पेशेवर रूप है। जो दूसरों को पर्याप्त लगता है — वृश्चिक जातक जानता है कि वहाँ और कुछ है। ज्येष्ठा नक्षत्र — इंद्र की, वरिष्ठ जिज्ञासा की — वह खोज-प्रवृत्ति देती है जो अपूर्ण जानकारी को दीर्घकाल तक बिना निष्कर्ष निकाले थाम सकती है। यह बहुतों से नहीं होता। अनुराधा — जो मित्रता और समर्पण की नक्षत्र है — वह दीर्घकालिक शोध-प्रतिबद्धता देती है। फोरेंसिक विशेषज्ञ, जासूस, खोजी पत्रकार — सभी इसी वृश्चिक-आवेग से चालित होते हैं: सच छिपा नहीं रह सकता।
रहस्य विद्या एवं ज्योतिष
रहस्य विद्या — छिपी हुई वस्तुओं का ज्ञान — वृश्चिक का प्राकृतिक क्षेत्र है। आठवाँ भाव गुप्त ज्ञान का, दीक्षा का, उन सत्यों का घर है जो सबके लिए नहीं। शतभिषा और अनुराधा — दोनों रहस्य-उन्मुख नक्षत्रें। ज्येष्ठा — इंद्र की — उस वरिष्ठता का बोध देती है जो तंत्र, ज्योतिष और नाड़ी-विद्या की गहराई में उतरने के लिए चाहिए। वृश्चिक ज्योतिषी की विशेषता क्या है? वह जातक के प्रश्न के पीछे के प्रश्न को पहचानता है। जो लोग 'करियर' पूछने आते हैं, वे अक्सर 'मैं कौन हूँ' पूछ रहे होते हैं। वृश्चिक यह जानता है — और वहाँ तक पहुँचता है।
वित्त, बीमा एवं कराधान
आठवाँ भाव दूसरों का धन, विरासत, बीमा और साझा संसाधन का घर है — और वृश्चिक इस भाव की राशि है। जोखिम का आकलन करना, जटिल वित्तीय संरचनाओं में छिपी त्रुटियाँ ढूँढना, कर-नीति की बारीकियों में नेविगेट करना — ये सभी वृश्चिक की खोजी प्रकृति के पेशेवर अनुप्रयोग हैं। बीमांकिक विशेषज्ञ — जो मृत्यु और आपदा की संभावनाओं की गणना करता है — यह शायद सबसे वृश्चिक-उचित व्यवसाय है। मृत्यु को संख्याओं में बाँधना। अनुराधा की निष्ठा और ज्येष्ठा का जटिलता-बोध मिलकर वह वित्त-विशेषज्ञ बनाते हैं जिस पर संस्थाएँ अपना सबसे संवेदनशील काम सौंपती हैं।
खनन, भूविज्ञान एवं पुरातत्त्व
पृथ्वी की सतह के नीचे उतरना — जो छिपा है उसे खोजना, जो अनदेखा है उसे उजागर करना — यह वृश्चिक का शाब्दिक व्यवसाय है। खनिज विज्ञानी भूगर्भ में जाता है। पुरातत्त्वविद् समय की परतों में उतरता है। भूवैज्ञानिक उन प्रक्रियाओं को समझता है जो लाखों वर्षों में पृथ्वी को बदलती हैं। ये सभी वृश्चिक-आवेग के विज्ञान-आधारित रूप हैं: जो दिखता है उसके पार देखना। मूल नक्षत्र — जो धनु में है पर वृश्चिक-धनु संधि पर — जड़ों तक जाने की, उखाड़कर सत्य जानने की नक्षत्र है। और अनुराधा की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता वह धैर्य देती है जो भूगर्भीय सत्य माँगता है।
कानून प्रवर्तन एवं खुफिया सेवा
जासूस, खुफिया विश्लेषक, खोजी पत्रकार — ये सभी एक ही वृश्चिक-धर्म का पालन करते हैं: जो जानबूझकर छिपाया गया है, उसे सामने लाना। मंगल का साहस और आठवें भाव की मनोवैज्ञानिक पैठ — दोनों मिलकर वह जाँचकर्ता बनाते हैं जो अपराध की सतह नहीं, उसकी आत्मा तक पहुँचता है। ज्येष्ठा नक्षत्र — इंद्र की, परम अधिकार की — वह खुफिया अधिकारी बनाती है जो विश्वास अर्जित करता है, थोपता नहीं। अनुराधा का मित्रता-गुण जासूस के काम में अप्रत्याशित रूप से काम आता है — स्रोतों का विश्वास जीतना, मानवीय संबंध से सूचना निकालना। वृश्चिक यह जानता है: सच हमेशा कहीं है — बस खुदाई करनी होती है।
औषध विज्ञान एवं विष विज्ञान
आयुर्वेद में एक गहरा सिद्धांत है: विष ही औषधि है — मात्रा बदलती है, पदार्थ नहीं। यह वृश्चिक का दर्शन है। जो मारता है, वही ठीक भी करता है — सही मात्रा में, सही समय पर। विष-वैज्ञानिक और औषध-विशेषज्ञ इसी संधि पर काम करते हैं। ज्येष्ठा — 'सबसे वरिष्ठ' — वह गहरा ज्ञान देती है जो यह जाने कि कौन सा पदार्थ किस देह में कैसे काम करेगा। अनुराधा की निष्ठा वह शोधकर्ता बनाती है जो वर्षों तक एक यौगिक के रहस्य को सुलझाने में लगा रहे। वृश्चिक इस क्षेत्र में इसलिए उत्कृष्ट है क्योंकि यह न तो विष से डरता है, न उसे रहस्यमय मानता है — वह उसे समझना चाहता है।
आध्यात्मिक परामर्श एवं शोक-सहायता
जो राशि मृत्यु के सबसे निकट रहती है — वही दूसरों को मृत्यु और हानि के पार ले जाने में सबसे सक्षम होती है। वृश्चिक ने अपनी गहराई में उतरकर वह देखा है जो अधिकांश लोग देखने से बचते हैं। यही उसे शोक-सहायक बनाता है — वह झूठा सांत्वना नहीं देता, असमय समाधान नहीं सुझाता। वह बस उपस्थित रहता है — उस अँधेरे में, जहाँ शोकाकुल व्यक्ति अकेला है। बृहस्पति वृश्चिक लग्न में पाँचवें भाव के स्वामी हैं — ज्ञान और आध्यात्मिक बुद्धि। यही वह प्रकाश है जो वृश्चिक परामर्शदाता दूसरे को दे सकता है: न झूठी आशा, न निष्ठुर सत्य — बल्कि वह गहरी समझ कि यह दर्द भी एक रूपांतरण है।
वृश्चिक राशि में जन्मे प्रसिद्ध व्यक्तित्व
Politician, businessman, and media personality
45th and 47th president of the United States and former real-estate developer and television host
स्रोत: AstroDatabankTheoretical physicist
Theoretical physicist who developed relativity and won the 1921 Nobel Prize in Physics
स्रोत: AstroDatabankBasketball player and businessman
American former professional basketball player and businessman who won six NBA championships with the Chicago Bulls.
स्रोत: AstroDatabankActress and producer
Australian-American actress and producer known for film, television and theatre work and for winning an Academy Award.
स्रोत: AstroDatabankActor
American actor known for The Godfather, Serpico, Dog Day Afternoon, Scarface and Scent of a Woman.
स्रोत: AstroDatabankSinger and actor
American singer and actor known for Hannah Montana, Bangerz, Wrecking Ball and Flowers.
स्रोत: AstroDatabankPolitician
American politician who served as the 38th president of the United States after Richard Nixon resigned.
स्रोत: AstroDatabankRapper and record producer
American rapper and record producer known for Odd Future, Igor, Call Me If You Get Lost and Camp Flog Gnaw.
स्रोत: AstroDatabankMedia executive and television host
American talk show host, media proprietor, actress and philanthropist best known for The Oprah Winfrey Show.
स्रोत: AstroDatabankMusician
American musician, Nirvana drummer and Foo Fighters founder.
स्रोत: AstroDatabankPolitician and businessman
American politician, former Massachusetts governor, 2012 Republican presidential nominee and U.S. senator from Utah.
स्रोत: AstroDatabankActress and politician
English actress and Labour politician who won two Academy Awards and served as an MP for 23 years.
स्रोत: AstroDatabankJazz singer, writer and critic
English jazz and blues singer, critic, writer and lecturer associated with the British trad-jazz scene.
स्रोत: AstroDatabankActor
Indian actor known for Hindi films, television work and Marathi serial roles.
स्रोत: AstroDatabankOpera tenor
French operatic tenor known for leading roles at La Scala, Covent Garden and the Metropolitan Opera.
स्रोत: AstroDatabankजन्म डेटा AstroDatabank (Rodden AA/A) से। वैदिक चंद्र राशि लाहिरी अयनांश से गणित।